कभी शिकायत नहीं की।
बेटा समझता था—
“पापा को फर्क ही नहीं पड़ता।”
जब बेटा फेल हुआ, पिता ने सिर्फ इतना कहा—
“अगली बार और अच्छा करना।”
तब बेटे को समझ आया—
पिता का प्यार शब्दों में नहीं, त्याग में होता है।
सीख:
माँ दुआ है, पिता छाया।
मिथिला के संस्कृति के संरक्षण हमर सबहक कर्तव्य अछि। कला स ल कए भाषा, पावनि स ल कए परम्परा तक एहि समृद्ध धरोहर कए आगामी पीढ़ी लेल सुरक्षित रखबाक चाही।
13 नवंबर की यह तस्वीर सिर्फ एक फोटो नहीं, बल्कि दो दोस्तों की ज़िंदगी की दो अलग-अलग राहों का खूबसूरत साक्ष्य है। समय बदलता है, आदतें बदलती ह...
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