इस तस्वीर में मैं और मेरा बचपन का दोस्त गोविन्द हैं। एक समय था जब हम एक ही गली के दोनों छोर थे—अलग नहीं हो सकते थे। लेकिन ज़िंदगी ने हमें दो बिल्कुल अलग रस्तों पर रखा। मैं प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हुए शहर की भागदौड़ में खो गया, जबकि गोविन्द ने अपने गांव में रहते हुए पूजा-पाठ, कथा वाचन और एक पंडित के रूप में लोगों को आध्यात्मिक राह दिखाई।
शहर की भीड़ और गांव की शांति—दोनों के बीच हमारी ज़िंदगी कभी समान नहीं रही, पर दिलों के बीच की दूरी आज भी उतनी ही छोटी है जितनी बचपन में थी।
कुछ दिनों पहले संयोग ऐसा बना कि मैं गांव आया हुआ था और गोविन्द को किसी दस्तावेज के काम से पटना जाना था। बस फिर क्या… पुराने दिनों की तरह हम दोनों साथ निकल पड़े। काम निपटाने के बाद थोड़ी राहत मिली, तो पटना का इको पार्क घूम आए। वहीं बैठे-बैठे हंसी के कुछ पल, पुरानी बातों की कुछ यादें, और दो दशक पुरानी दोस्ती की खुशबू फिर से ताज़ा हो गई।
वापसी में दुर्भाग्य से गोविन्द का मोबाइल मोकामा के पास चोरी हो गया—एक कड़वी सच्चाई, जो बताती है कि बेरोज़गारी की मार कितनी गहरी है। पर राजनीति पर अब विराम… क्योंकि इस कहानी का रंग दोस्ती है, दुःख नहीं।
17 नवंबर की सुबह हम दोनों अपने-अपने रास्तों पर लौट पड़े—वह गांव रुपौली में, और मैं अपने काम के लिए फिर से महाराष्ट्र की ओर। इस वक्त मैं इसी सफर में हूं, शायद रात तक शहर पहुँच जाऊँगा… पर मन अभी भी उसी इको पार्क की हंसी में कहीं अटका हुआ है।
ज़िंदगी हमें जहां भी ले जाए,